• 4 November, 2026 - 11:03 AM

गारमेंट के निर्यातकों को RoSCTL के लाभ न मिलने से वर्किंग कैपिटल का संकट

गारमेंट के निर्यातकों को RoSCTL के लाभ न मिलने से वर्किंग कैपिटल का संकट

आरओसीटीएल (RoSCTL) के लाभ से निर्यातक पाँच महीने से वंचित गारमेंट के निर्यातकों को RoSCTL के लाभ न मिलने से वर्किंग कैपिटल का संकट: निर्यात के ऑर्डर समय पर पूरे करने के लिए कच्चा माल खरीदने हेतु पूँजी की पैदा हो रही कमी से निर्माता परेशान ई-स्क्रॉल इश्यू कर दिए जाने के बावजूद संबंधित अधिकारी क्वेरी निकालते हुए मजूरी/मंजूरी देने में देरी कर रहे हैं, ऐसा आरोप भारत सरकार द्वारा रेडीमेड गारमेंट और टेक्सटाइल क्षेत्र को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने के उद्देश्य से ‘रिबेट ऑफ स्टेट एंड सेंट्रल टैक्सेस एंड लेवीज़’ (Rebate of State and Central Taxes and Levies) योजना के तहत निर्यातकों को मिलने वाले लाभ पिछले पाँच महीनों से न मिलने के कारण उन्हें वर्किंग कैपिटल की तंगी का सामना करना पड़ रहा है। इस योजना के तहत गारमेंट के निर्यातकों को RoSCTL के 1.5 प्रतिशत से लेकर 6.05 प्रतिशत तक के लाभ दिए जाते हैं। यह लाभ देने के लिए कस्टम्स डिपार्टमेंट की तरफ से गत जुलाई महीने में स्क्रॉल इश्यू हो जाने के बावजूद अभी तक सरकार की तरफ से पैसे नहीं मिले हैं। साथ ही, आगामी दिसंबर-जनवरी तक यह न मिलने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे निर्यातकों की परेशानी की कोई सीमा नहीं रही है। दुनिया के किसी भी देश में निर्यात करने वालों को RoSCTL का लाभ दिया जाता है।

केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्रालय तथा डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) के नियमों के अनुसार, निर्यातकों को वस्तुओं के निर्यात के लिए जहाज तक के खर्च और उत्पादन मूल्य की कुल राशि के 1.5 प्रतिशत से 6.05 प्रतिशत तक अप्रत्यक्ष कर के रिफंड के रूप में RoSCTL के लाभ देने का आधिकारिक प्रावधान है। एचएसएन कोड (HSN Code), यानी वस्तुओं की पहचान के कोड के तहत किए गए वर्गीकरण के अनुसार ये लाभ दिए जाते हैं। निर्यात के लिए DGFT (डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड) के नियमों से जुड़े चैप्टर 62 के तहत बुने हुए कपड़े से बने रेडीमेड गारमेंट्स और एक्सेसरीज़ तथा चैप्टर 63 के तहत बनाई गई टेक्सटाइल की तैयार आइटम्स, मेड-अप्स, होम टेक्सटाइल्स और बेडशीट्स के निर्माताओं को यह मिलता है।

गत जुलाई महीने में माल का निर्यात हो जाने के बाद कस्टम्स डिपार्टमेंट ने ई-स्क्रॉल इश्यू कर दिए हैं। इस प्रकार निर्यात की गई वस्तुएं बिल्कुल सही हैं। इसके लिए उन्हें RoSCTL के तहत मिलने वाले वित्तीय लाभ दिए जा सकते हैं, ऐसा कस्टम्स के अधिकारियों द्वारा स्पष्ट रूप से बता दिए जाने के बावजूद आज तक उन्हें मिलने वाले लाभ के पैसे सरकार की तरफ से जमा नहीं किए गए हैं। कस्टम्स डिपार्टमेंट और इंडियन कस्टम्स के गेटवे-आइसगेट (ICEGATE) ने इन ई-स्क्रॉल को अपने आप जनरेट कर दिया होने के बावजूद निर्यातक पिछले 4 से 6 महीनों से इन लाभों से वंचित हैं। क्योंकि केंद्रीय वित्त मंत्रालय बजटीय आवंटन में देरी कर रहा है। साथ ही, पोर्टल के तकनीकी बैकलॉग के कारण यह प्रोत्साहन राशि निर्यातकों के डिजिटल खाते में जमा नहीं हुई है। निर्यातकों को आगामी दिसंबर-जनवरी तक ये पैसे मिलने के कोई संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं, ऐसा फेडरेशन ऑफ कस्टम्स ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पार्थिव दवे का कहना है।

गारमेंट सेक्टर में मुनाफे का मार्जिन कम होने के कारण 3 से 5 प्रतिशत तक के RoSCTL के लाभ रुकने से निर्यातकों की मुनाफाप्रदता (profitability) नेगेटिव हो जाती है। परिणामस्वूप, कच्चा माल खरीदने, मजदूरी चुकाने और बिजली जैसे ऑपरेशनल खर्च पूरे करने के लिए निर्यातकों को अपनी बैंक लिमिट बढ़ाकर या बाजार से ऊंचे ब्याज दर पर अतिरिक्त कैपिटल इन्वेस्टमेंट करना पड़ रहा है। वित्तीय संकट के कारण नया कच्चा माल समय पर नहीं खरीदा जा सकता है, जिसकी सीधी असर अंतरराष्ट्रीय शिपमेंट शेड्यूल पर पड़ता है और वैश्विक बाजार में भारतीय निर्यातक अपने ऑर्डर खो रहे हैं।

RoSCTL के क्लेम मंजूर करने की सत्ता रखने वाले असिस्टेंट कमिश्नर और डिप्टी कमिश्नर स्तर के अधिकारी स्क्रूटनी के नाम पर निर्यातकों से नए-नए प्रमाण माँग रहे हैं। वे बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा आने का ई-बीआरसी (e-BRC) या आईआरएम (IRM) कन्फर्मेशन, कच्चे माल की खरीद के GSTR-3B और इनवॉइस, माल सेल्फ-मैन्युफैक्चरिंग है या जॉब वर्क से बना है, उसके प्रमाण तथा एचएसएन कोड के उचित वर्गीकरण के संबंध में विशिष्ट सर्टिफिकेट्स माँग रहे हैं। इस प्रकार की प्रक्रियात्मक जटिलताओं और बार-बार की जाँच के कारण सामान्य प्रोसेसिंग में अतिरिक्त 90 से 120 दिनों की देरी होती है।

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